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राजद्रोह कानून पर तेज हुई सियासत, विपक्ष ने कहा- अंग्रेजों के दौर के कानून की भारत को जरुरत नहीं

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नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने भारतीय दंड संहिता की धारा-124 ए (देशद्रोह) का फिर से परीक्षण और पुनर्विचार करने का फैसला किया है. केंद्र ने अपने हलफनामा में कहा कि इस दौरान वह देशद्रोह से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई न करे. केंद्र के इस फैसले के बाद सियासत भी तेज हो गई है.

पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने इस सिलसिले में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि हमने पिछले कुछ महिनों और सालों में देखा है कि कैसे राजनीतिक पार्टियों ने इस क़ानून का दुरुपयोग कर संविधान के मूल मर्यादा और अक्स पर प्रहार किया. इसे जितनी जल्दी हटाया जाए बेहतर है. यह अंग्रेजों के वक्त का क़ानून है जिसका कुछ औचत्य नहीं है.

वहीं इस मामले को लेकर कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि केंद्र ने उच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर कहा कि वे राष्ट्रद्रोह के प्रावधान पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार है. हमारा मानना है कि इस धारा को भारत के फ़ौजदारी से निकाल देना चाहिए. ऐसा लगता है कि सरकार नहीं चाह रही कि उच्च न्यायालय इस पर कोई फैसला ले.

राजद्रोह कानून पुराना हो चुका है- किरेन रिजिजू

राजद्रोह कानून मामले पर केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि राजद्रोह कानून का मालमा कई दिनों से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. हमने सुप्रीम कोर्ट को साफ-साफ बताया कि प्रधानमंत्री के आदेश पर ये फैसला लिया गया है कि राजद्रोह कानून पर हम पुनर्विचार और पुन: जांच करेंगे. अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे लगभग 1500 ऐसे कानून हैं जिनकी जरूरत नहीं थी और उन्हें हमने हटाया है और राजद्रोह कानून भी पुराना कानून है.

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