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देश के पवित्र स्थानों की मिट्टी और नदियों के जल से शिलाओं का किया गया पूजा

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श्री स्वामीनारायण सम्प्रदाय के तीर्थधाम वड़ताल में रामनवमी के पावन अवसर पर करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित हुए दिव्य एवं भव्य संग्रहालय-अक्षर भुवन का शिलान्यास किया गया. आचार्य श्री राकेश प्रसाद जी महाराज और संप्रदाय के वरिष्ठ संतों के हाथों से संग्रहालय-अक्षर भुवन का शिलान्यास किया गया.

इस अवसर पर विभिन्न धामों से आने वाले 108 संत और 108 हरिभक्तों ने शिलाओं की पूजा कर हजारों संतों और हरिभक्तों ने इस दिव्य दृष्टि का लाभ उठाया और धन्यता का अनुभव किया.

वड़ताल मंदिर के कोठारी डॉक्टर संत वल्लभदासजी स्वामी ने इस मौके पर समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान श्री हरि ने जहां भी यात्रा की थी और जिन चीजों का इस्तेमाल किया था ऐसी प्रसादी चीजों को नंद संतों और हरिभक्तों ने अपनी नई पीढ़ी के लिए एकत्र कर रखा है. इन प्रसादी वस्तुओं का सभी हरिभक्त दर्शन कर सके इसलिए आचार्य श्री लक्ष्मी प्रसादजी महाराज के हाथों से मंदिर परिसर में मौजूद अक्षरभुवन का उद्घाटन किया गया. जहां प्रसादी का सामान रखा जाता है. इन प्रसादी वस्तुओं का सर्व हरिभक्त दर्शन कर सकें इसके लिए गोमती किनारे डेढ़ सो करोड़ के खर्च से और गुलाबी पथ्थर से बने दिव्य और भव्य वर्ल्ड क्लास नूतन अक्षरभुवन का उद्घाटन आचार्य श्री राकेश प्रसादजी महाराज संप्रदाय के वरिष्ठ संतों-महतों और हरिभक्तों की उपस्थिति में आयोजित की गई थी.

आचार्य महाराज और संतों द्वारा शिलाओं की पूजा की गई, उसके बाद महाराज श्री और संतों के द्वारा उद्घाटन किया गया. इस मौके पर धाम-धाम से संतों द्वारा लाई गई ईंट और विभिन्न नदियों के पवित्र जल से शिलाओं का पूजा और फिर आरती उतारी गई. इस मौके संप्रदाय के पूज्य ज्ञानजीवन स्वामी कुंडणवाला ने अक्षरभुवन की महिमा का वर्णन किया, इसके अलावा शास्त्री नौतमप्रकाशदास जी ने अपनी परंपरा में मिले भगवान श्री हरि का प्रसादी का पितांबर नूतन अक्षरभुवन में दर्शनार्थियों के लिए आचार्यश्री ने अर्पण किया.

इस मौके पर उपस्थित संप्रदाय के पूज्य संतों ने प्रासंगिक उदबोधन दिया था. पूज्य लालजी सौरभ प्रसादजी ने कहा कि वड़ताल धाम में बनने वाला नया अक्षर भुवन विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय होगा. जिसमें भगवान श्री हरि प्रसादी की वस्तुओं को हमारी आने वाली पीढ़ी 2000 साल तक देखेगी.

इस पूरे कार्यक्रम का संचालन श्याम वल्लभ स्वामी और श्री गुरुकुल के हरिकृष्ण स्वामी और प्रियदर्शन स्वामी पीज वाला ने किया था.

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